Wednesday, October 26, 2011

इसलिए सीमा पर डटकर वे झेलते हैं गोली.

खुश हो लेते हैं हम नकली पटाखे छोडकर
नाच उठाते उमंग से हम अनार को जलाकर.
 
जरा सोचो ख़ुशी उनकी, उमंग तरंग उनकी
जो गोले छोड़ते हैं, बम असली फोड़तें हैं.
 
हम माना सकें दीवाली, हम खेल सकें होली
इसलिए सीमा पर डटकर वे झेलते हैं गोली.
 
हम सजाते दीपक से घरों को, घी-तेल डालते है.
हमारा भविष्य सवारते वे, अपना लहू जला के.
 
आज आइये! नाम उनके कुछ दीप हम जला दें.
हो गए हैं जो शहीद, उन्हें दीप मालाओं से सजादे .

4 comments:

  1. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 28-12-2011 को चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  2. जवानों के जज़्बे को शुंदर शब्दों में ढाला है आपने । नया साल खुशियां लेकर आये ।

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  3. Thanks to all for kind visit and comments.

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