Sunday, January 12, 2014

नारी बनाम नारी


नारी बनाम नारी 

(चौखट प्रतीक से ‘नारी-विमर्श’ की अद्भुत काव्य-कहानी, दो सहेलियों की जुबानी)

आत्म निवेदन

सम्मानित नारी समाज! चिर ऋणी हूँ, और रहूँगा, आपका। कुछ कहने सुनने को लिया है शरण आपका। सत्य है यह- ‘शक्ति बिन जब शव है शिव’, तो बिना नारी-शरण, क्या करता यह क्षुद्र जीव? बनकर एक नारी ही छेडी यह ‘नारी - परिचर्चा’, आप के सम्मुख प्रस्तुत है अब यह परिचर्चा. इस विमर्श मे दोनों पात्र हैं- ‘प्रगति’ और ‘आशा’, दोनों ही हो सकती हैं वास्तविक भी, काल्पनिक भी. कायिक भी, मानसिक भी, निरा पारिवारिक भी, प्रखर दार्शनिक भी और भौतिक जगत की संवेदनशील वैज्ञानिक भी. अथवा हो सकती hain ये अपने ही मन की, सत्ता-अंतरसंवेदनएन संवेदनाएं भी. परिचर्चा में जितने वास्तविक, जीतने काल्पनिक ये चर्चाकार,उतने ही पौराणिक और काल्पनिक हैं- ‘मनु’ और ‘श्रद्धा’। इस विमर्श में मनु-श्रद्धा का, शतरूपा-ईव-हौवा या कामायनी का, यदि चित्र उभरता कुछ स्याह–प्रगाढ़ तो इसमें हैरानी क्या? परेशानी क्या? ये अंतर्वस्तु के रूप में तो सदैव ही हैं विद्यमान और परिचर्चा सन्दर्भों के संग, साथ साथ ही हैं गतिमान. ‘प्रगति’ है मानव की चाहत, इच्छा, अभिलाषा। प्रेरक, संबल, पथप्रदर्शक रूप मे है आशा। ‘आशा’ उसका उत्साह बढाती. लक्ष्य तक उसको पहुचाती, क्या आ सकती समस्या आगे? क्या हो सकता उचित समाधान? यह भी ‘आशा’ ही बताती. यथोचित प्रश्न हैं इस परिचर्चा में, और इतने ही हैं प्रश्नोत्तर. विमर्श यह कितना उपयोगी? देना है ध्यान इसी पर वास्तविक. चर्चा का प्रारम्भ विंदु ही मानवीय सभ्यता और सांस्कृतिक विकास को लेकर पशुता और मानवता के स्थूल जीवन यापन विंदु से प्रम्भ हुआ है और क्रमशः सूक्ष्मता मे उतरता हुआ, कायिक-सुख से मानसिक सुख-संतुष्टि से होता हुआ अनेक सामाजिक-दार्शनिक अवधारणाओं, मानकों और मूल्यों को संशपर्श करता है।

      वास्तव मे मानव जीवन और पशु जीवन में एक बहुत बड़ा है अंतर, पशु रहता प्रकृति-प्रदत्त में, मानव निज संरचना अन्दर. छत्ता हो, या बाम्बी हो या हो घोसला पक्षियों का, या तकनीक हो बया जैसों का, होती है यह एक रचना ही. लेकिन इनमे चेतना का, संवेदना का वैसा सन्दर्भ नहीं सम्बन्ध वहाँ ‘विषय’ और उसके ‘विशिष्ट अर्थ’ का नहीं.फिर भी सभ्यता यह उनकी, विशिष्ट पहचान है उनकी. संरचना यह क्रिया मन की, चिति की और चेतना की. सुदृढ़ हो जाती संरचना, बन जाती धरोहर संस्कृति की. उपन्यास, कहानी, चित्र, गीत, गजल, रुबाई और कविता, झोपडी, घर, महल,, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या दुकान। सड़क, पगडण्डी, पोखर, तालाब, समाज, रहा-सहन, विधान-संविधान. ये सभी अभिव्यक्तियाँ ही, मानव मन की, संस्कृति की, प्रतीक ये ही मानवीय सभ्यता के, उसकी अब तक की प्रगति की. उन्हीं प्रतीकों में एक प्रतीक यह चौखट, स्वीकृत जनजीवन तक. चंचल मन की चंचलता को, मन की अपनी स्वच्छंदता को, क्षण भर के लिए ही टोके जो, स्वविवेक से नाता जोड़े जो. औचित्य-तुला कार्य जहाँ, समझिये चौखट का औचित्य वहाँ. चौखट तो एक विषय मात्र इसके व्यापक और विस्तृत अर्थ, रहना हमें सीमित सन्दर्भों तक जितने में पूर्ण हो यह विमर्श। इस चौखट से फूटती दो शाखाएं, एक आँचल की, दूसरी पगड़ी की. यह चौखट अब रूप लेता है- ‘त्रिक’ का और बन जाता नियामक समाज का. समाज के समस्त कार्य-व्यापार परिचालित कार्य -कारण शृंखला से। इसी के समानान्तर है अर्थ की अपनी अतिमहत्वपूर्ण भूमिका। इस अर्थ की है अपनी विशिष्ट संरचनात्मक वृत्ति भंगकर ‘कार्य-कारण श्रृंखला’ कराती है अधिष्ठापित मानव को, जो कहलाती है- ‘स्वतंत्रता’. यह स्वतंत्रता ही मानव को, एक भोक्ता से एक कर्ता है बनाती. प्रगति, मंगल और कल्याणकारी कार्य के रूप मे यह स्वतन्त्रता का है अत्यंत समादरित स्थान लेकिन होती जब विकृत यह स्वतंत्रता, मानवता को रसातल तक पहुँचाती. जब भी करती अतिक्रमण यह स्वतंत्रता, मानव के कल्याण का संज्ञा तत्क्षण ही बदलती इसकी, अब यह ‘स्वच्छंदता’ कहलाती, कर्ता-कार्य पर अनेक प्रश्न उठाती।

      क्या लेगा आकर यह, ‘नारी मुक्ति आन्दोलन’ आज और इस समाज में क्या-क्या, नया परिवर्तन यह लायेगा आज? मानव कल्याण के ही सापेक्ष तो उचित-अनुचित कहलायेगा। कई विकल्प समक्ष हैं आते, जब चिति कोई योजना बनाती; मानवता को ही दृष्टिगत रखकर, इसमें सुधार-परिष्कार करती, कराती. चौखट तो है एक मर्यादा और व्यवस्था, अपनी इस समाज की, अपनी संस्कृति की, सभ्यता की, संविधान की और राष्ट्र की. प्रभाव में पाश्चात्य हवा के, मर्यादा इस चौखट की गए हैं हमसब भूल। इस चौखट की दीप्ति चमकाने को, अपनी संस्कृति का मान बढ़ाने के लिए ही किया है एक प्रयास, एक कोशिश झाड़ने-पोछने की, इसके ऊपर जमी है जो मोटी-पर्त धूल. इसी प्रयास में उठे यहाँ प्रश्न बहुत, सुने-सुनाये, कुछ नये-पुराने। कौन-कौन से प्रश्न? और कैसा समधान? यही है विषय उत्सुकता की, आलोचना-समालोचना की।

      अब कोई चाहे तो अनावश्यक, या बकवास भी कह सकता है इसे इतिहास, साहित्य और दर्शन का कोरा प्रलाप भी कह सकता इसे लेकिन है कितना आवश्यक? यह सांस्कृतिक - ऐतिहासिक ज्ञान शायद वह इसे नहीं जानता, समय की गति को नहीं पहचानता समय प्रदान करता है- अवसर, पर्याप्त सुधार और परिष्कार का लेकिन है यह समय ही जो कभी, किसी को क्षमा नहीं करता अपने सीने पर अनावश्यक बोझ कभी भी यह जमा नहीं करता. कोई भी ऐतिहासिक, साहित्यिक विवेचन या दार्शनिक सन्दर्भ अथवा उल्लेख गौरवमयी अतीत का, नहीं होता गड़े मुर्दे उखाड़ना होता है यह तार्किक विश्लेषण, उन घटनाओं के घटित होने का. समाज, संस्कृति, सभ्यता, राष्ट्र पर, उसके प्रभाव - दुष्प्रभाव का. यह परिचर्चा यह भी बतलाता, क्या अबतक सीखा यह समाज विशेष और क्या कुछ सीखना, समझना और सुधरना अभी रह गया है शेष?

      क्या हमसब नहीं जानते यह सिद्धांत? हराना हो किसी देश को यदि मिटा दो उसकी अपनी संस्कृति, कर दो विकृत उसकी दार्शनिक प्रवृत्ति. निकलते ही प्राण, तन गिर जाएगा, वह देश अपने आप ही मिट जाएगा. हमें प्यार है अपने देश से, अपनी संस्कृति से, अपनी प्यारी प्रकृति से इसलिए बेहद प्यार है मुझे, ऐसी दार्शनिक, साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा से. भले ही किसी और को इस परिचर्चा से, हो न हो कोई विशेष सरोकार, लेकिन अच्छी तरह जानता हूँ, राष्ट्र प्रेमियों को है आज इसकी दरकार. अब इस सन्दर्भ में हो चाहे जितनी भी आलोचना, मुझे सब स्वीकार. आधार मानकर इसी एक विन्दु को, परिचर्चा ने विमर्श का रूप लिया है, होगा यह कल्याणकारी ही अंततः, मेरी चिति ने तो यही सन्देश दिया है. अंत मे समर्पित आप को ही यह परिचर्चा, विचारार्थ और समीक्षार्थ। कर सका यदि यह समाज कल्याण अंशतः भी तो होगा वही मेरा परिश्रमिक, परितोषिक और पुरुषार्थ। 

 

स्थान: तिवारी सदन                डॉ. जयप्रकाश तिवारी

दिनांक:                             भरसर, बलिया (उ.प्र.)  

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