Sunday, April 17, 2011

प्रज्ञान - विज्ञान परिचर्चा - २

डॉ. रामू - आचार्य जी! ये सब लाजिक आपने कहाँ से लिया है? आपके ज्ञान का स्रोत क्या है?

आचार्य जी - यह स्रोत 'भारतीय संस्कृति' है बेटा! मेरे पास जो कुछ भी है सब इसी की देन है. हमारी संस्कृति त्रिपदा है, इसके तीन पाद है - धर्म, दर्शन और कला. हमारी संस्कृति के इस एकत्व को प्रायः 'सत्यं - शिवं - सुन्दरम' के सूत्र में परिभाषित किया गया है. परम सत्य के रूप में 'सत्यं' की विषद विवेचना ने हमारी दार्शनिक परंपरा को समृद्धशाली बनाया, उसी प्रकार 'शिवं' की सुदीर्घ व्याख्या ने धर्म क्षेत्र को; और इन दोनों ही अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हुयी है कला के क्षेत्र में. अतएव इन तीनो में से किसी की अवहेलना, किसी को छोड़ को छोड़ देना भारतीय संकृति को न्यून और अपूर्ण बना देगी. संस्कृति इस तीनो का गुणनफल है. इस प्रकार इस संस्कृति का सिद्धांत पक्ष 'दर्शन', व्यव्हार पक्ष धार्मिक जीवन पद्धति एवं अभिव्यक्ति का माध्यम विभिन्न प्रकार की कलाएं हैं.

बेटे! आज जिसे तुम विज्ञान कहते हो, वह भी दर्शन की ही देन है. इसका प्रमुख कारण यह है कि सृष्टि के प्रादुर्भाव से लेकर उसके प्रलय तक क़ी विवेचना का सम्पूर्ण क्षेत्र, 'दर्शन शास्त्र' का कार्य क्षेत्र है. परन्तु दर्शनशात्र का भाग्य अथवा दुर्भाग्य यह है कि जब तक कोई समस्या चिंतन-विवेचन और परीक्षण के स्तर तक होती है - वह दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में होती है. परन्तु जैसे ही उस समस्या का समाधान हो जाता है, उसमे कार्यरत सिद्धात को ढूढ़ लिया जाता है; वह वह दर्शन शास्त्र से अलग होकर किसी न किसी शास्त्र में अपना स्थान सुरक्षित कर लेता है. भौतिक जगत के सभी प्रश्न, सभी जिज्ञाशाएं दर्शन शास्त्र के ही प्रश्न हैं परन्तु सिद्धांत अन्वेषण के पश्चात भौतिक शास्त्र, गणित शास्त्र, रसायन शास्त्र, खगोल शास्त्र, समाज शास्त्र इत्यादि में समाहित हो गए और उसे समृद्ध किया. साहित्य भी इससे अलग नहीं है. किन्तु हर्ष क़ी बात यह है कि दर्शन शास्त्र में प्रश्नों की कमी नहीं. वह नित नए प्रश्नों को उठता रहता है, विवेचना करता रहता है और अन्वेषण - परीक्षण कर अन्य अनुषांगिक शास्त्रों को निरंतर समृद्ध कर रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा. बेटे! तुम जिस वैज्ञानिक शोध की बात कर रहे हो न, वह भी दर्शन परंपरा की ही देन है; और जो उपाधि तुम्हे मिली होगी वह Ph,D अथवा D.Phil. ही होगी. ( Doctor of Philosophy). क्यों सही है न डॉ, रामू?

डॉ. रामू - Absolutely right sir! what अ surprising and what an interesting sir! परन्तु यह धर्म बांटने का कार्य क्यों करता है? क्या आज सामाजिक कलह का कारण यह धर्म ही नहीं है?

आचार्य जी - नहीं बेटे! कदापि नहीं!! यह निरा भ्रम है. भारतीय संस्कृति स्पष्ट कहती है - "यस्तर्केणानुसंधते स धर्म वेद नापरः ". अर्थात जो तर्क और विवेक से धर्म ग्रंथों का परायण, अध्ययन और अनुसन्धान करता है, औचित्य-अनौचित्य की गहण विवेचना करता है, वह धर्म है. धर्म की मर्यादा लोक मंगल में निहित है, शांति सृजन में है; कलह और कोलाहल में नहीं.इर्ष्य-द्वेष के प्रश्रन में नहीं. उसका तो उद्देश्य है - 'प्रेम', 'अलौकिक प्रेम'.
बेटे! तुम्हारा आक्षेपण भी प्रलाप नहीं है. यह आक्षेप किसी सीमा तक रेलिजन और सम्प्रदाय के लिए तो सही हो सकता है लेकिन धर्म के लिए नहीं. रेलिजन या संप्रदाय शब्द धर्म का पर्यायवाची नहीं है. भारतीय संस्कृति में 'धर्म' दर्शनशास्त्र का व्यावहारिक पक्ष है. दर्शन का सिद्धांतपक्ष सतत तर्क और विवेक की कसौटी पर कसे रखकर धर्म को पदच्युत होने और उसे रेलिजन-पंथ-सम्प्रदाय जैसे एकांगी परिभाषाओं, संकीर्णताओं से उबारकर उसे सार्वभौमिक, लोकमंगल, लोककल्याण के सर्वोच्च स्तर तक बनाये रखता है. भारतीय संस्कृति के नीति-नियामक ग्रंथों में एक ओर धर्म के दस लक्षण बताकर उसे रेखांकित किया गाया है, वहीँ दूसरी ओर धर्म की व्यावहारिक परिभाषा देकर सरलीकृत भी किया गाया है, जैसे - "धारणात असौ सः धर्मः". अर्थात जिसके कारण हमारा अस्तित्व है वही हमारा धर्म है. जिसके अभाव में हमारा अस्तित्व मिट जाय वही हमारा धर्म है. जिस प्रकार अग्नि का धर्म है' उष्णता', जल का धर्म है 'तरलता'. उष्णता के अभाव में हम उसे अग्नि नहीं 'राख' कहेंगे. तरलता के अभाव में हम उसी तत्व को अब जल नहीं बर्फ कहेंगे. गैसरूप बन जाने पर उसे जल नहीं वाष्प कहेंगे.

बेटे! तुम्हारा विज्ञान रासायनिक संरचना के अधर पर उस पदार्थ में भले कोई भेद न कर, उसे H2O के रूप में पहचान की छूट दे राखी हो. हमारी संकृति ने, हमारे दर्शन ने ऐसी कोई छूट नहीं दी है. इस सिद्धांत के पालन में वह कठोर है. इस कठोरता का ही परिणाम है की धर्म के सन्दर्भ में जितने तर्क-वितर्क, सुधार-परिष्कार, परिवर्द्धन-परिशोधन भारतीय संस्कृति में मिलेंगे, उतने दूसरे किसी भी संस्कृति में नहीं. इस सन्दर्भ में मानव का धर्म है -"मानवता'. इंसान का धर्म है -"इंसानियत". जिस क्षण हम मानवता खो देंगे, इंसानियत छोड़ देंगे; उसी क्षण एक मानव रूप में हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. भले ही रंग-रूप -आकार-प्रकार भले मानव जैसा क्यों न हो. अब हमारी पहचान दो रूपों में हो सकती है - 'देवत्व' अथवा 'दानवत्व'. हमारी संस्कृति ने देव बनने की प्रक्रिया को प्रगति और दानव बनने की प्रक्रिया को पतन कहा गया है. और इस प्रकार प्रगति को देव और पतन को दानव कहने का साहस रखने वाली विश्व में केवल एक ही संस्कृति है, और वह है अपनी भारतीय संस्कृति. इस संस्कृति के सबल पक्ष के साथ हम अपनी दुर्बलता पर भी ध्यान अवश्य देना चाहिए. यदि तुम्हारे कथन का आशय यह है तो मै इससे सहमत हूँ. बेटे! भटकाव पर चिंता हमें भी है, अपनों से है किन्तु यह दोष मानव का है धर्म - सिद्धांत का नहीं. सारा दोष हमारी भटकाव का है - हम बातें तो बड़ी-बड़ी धर्म और दर्शन की करते हैं. 'ईशावास्यमिदम सर्वं' का उद्घोष और जगत में यत्र-तत्र-सर्वर्त्र खुदा की नूर देखने की वकालत तो खूब करते हैंपरन्तु जन्मे - अजन्मे बेटियों में, पड़ोसियों में, मजदूरों और मजबूरों में उसी नूर का दर्शन क्यों नहीं का पाते? हम इतनी सि बात समझ क्यों नहीं पाते कि सिद्धांत छल है, कृति और पुरुषार्थ के बिना. शब्द तो अक्षरों का मेल मात्र है, इसका समस्त गौरव - मर्यादा - गरिमा - मूल्य तो सन्निहित है इसके अर्थमे. अरे वह तो गुम्फित है, आचरण और कृति में. परन्तु आज यह शब्दों के पुजारी और इश्वरत्व के संवाहक होने का दावा करनेवालों के आचरण और व्यवहार में दृष्टिगत क्यों नहीं है? इस लिए कि हम भटक गए हैं, अपनी संस्कृति में आस्था और विश्वास नहीं रहा, हम उससे कट रहें है, भाग रहे हैं -

भटक गए है आज लक्ष्य से, निज संस्कृति से हम दूर हो रहे.
अध्यात्म शक्ति को भूल गए, भौतिकता में ही मशगूल रहे.
पूर्वजों की उपलब्धियों में, छिद्रान्वेषण ही नित करते रहे.
परिभाषाएं स्वार्थ परक, परम्पराएँ सुविधानुकुल गढ़ते रहे
मोक्ष-मुक्ति, निर्वाण-कैवल्य, फना -बका में ही उलझे

श्रेष्ठतर की प्रत्याशा में, वर्चस्व की कोरी आशा में;
अंहकार - इर्ष्या में जलकर, अरे ! देखो क्या से क्या हो गए?
बनना था 'दिव्य मानव', और बन गए देखो 'मानव बम'.
इससे तो फिर भी अच्छा था, हम 'वन - मानुष' ही रहते.
शीत - ताप से, भूख -प्यास से, इतना तो नहीं तड़पते.

अरे भटके हुए महानुभावों!, हमें नहीं स्वर्ग की राह दिखलाओ .
कामिनी- कंचन, सानिध्य हूर का, भ्रम जाल यहाँ मत फैलाओ.
दिव्यता की बात भी छोडो, हो सके तो मानव को मानव से जोडो.
अरे!अब रहे न कोई'वन मानुष' अब बने न कोई 'मानव बम'.
कुछ ऐसी अलख जगाओ, दिव्यता स्वर्ग की यहीं जमीं पर लाओ.
अब हमको मत बहलाओ, दिव्यता स्वर्ग की इसी जमीं पर लाओ.

डॉ. रामू - आचार्य जी! हमें लगता है कि इस सेंसटिव मैटर पर हम लोग कहीं न कहीं निकट भी हैं. आचार्य जी! अभी आपने कहा है कि भारतीय संस्कृति सृष्टि से प्रलय तक की घटनाओं पर विचार करती है. क्या इस सम्बन्ध में कुछ...., Sir! really I want to know...some aspects, more aspects of our culture, our philosophical views. Really I am too much exited sir!!

आचार्य जी - बेटे! तूने बड़ा जटिल प्रश्न उठाया है, परन्तु मुझे अपार हर्ष है कि तुम्हारी रूचि, तुम्हारी जिज्ञासा बढ़ रही है. यह तुम्हारे अन्दर उठ रही उथल-पुथल, इस बात का परिचायक है कि न केवल तुम श्रवण कर रहे हो, बल्कि मनन - मंथन भी चल रहा है. बहुत ही शुभ लक्षण है यह. बेटे श्रृष्टि से पहले शून्य है, महाशून्य. इस शून्य को जाने बिना सृष्टि को, सृजन प्रक्रिया को नहीं जाना जा सकता. जिसे हम नाम-रूपमय प्रकृति कहते है, वह है शून्य में सृजन, शून्य से अनंत. जटिल किन्तु रोचक विषय है यह. अपनी बात प्रारंभ करने से पूर्व मैं काल और कालातीत की चर्चा करना चाहूँगा क्योकि सृजन और प्रलय तो आवर्ती है, periodical है और इसके लिए काल (Time) की अपेक्षा है.

1 comment:

  1. भारतीय संस्कृति के गूढ़ तत्वों को विश्लेषित करती आपकी प्रस्तुति आपके अद्भुत ज्ञान को प्रदर्शित करती है .बहुत आनंद आया आपके ब्लॉग पर आकर .आभार .

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